भोपाल/इंदौर। मध्यप्रदेश में कम बारिश के कारण आने वाली गर्मियों से पहले ही जलसंकट की आशंका बढ़ने लगी है। प्रदेश के 11 जिलों में सामान्य से 80 प्रतिशत या उससे कम बारिश दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। नदियों, तालाबों और बांधों में पर्याप्त पानी नहीं होने से पेयजल आपूर्ति और खेती पर असर पड़ने की चिंता बढ़ गई है। इंदौर नगर निगम ने जल प्रबंधन के लिए सरकार से 50 करोड़ रुपये का पैकेज मांगा है, जबकि उज्जैन में गंभीर डैम में सीमित पानी के कारण करीब 70 दिन की जलापूर्ति का आकलन किया गया है।
इंदौर में 18 साल बाद गंभीर जलसंकट की आशंका
इंदौर में इस बार सामान्य से करीब 14 इंच कम बारिश हुई है। आमतौर पर शहर में लगभग 37 इंच बारिश होती है, जबकि इस बार करीब 23 इंच पानी बरसा। शहर को रोजाना लगभग 800 एमएलडी पानी की जरूरत होती है। ऐसे में घटते जलस्तर ने नगर निगम की चिंता बढ़ा दी है।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने जल प्रबंधन के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से 50 करोड़ रुपये का पैकेज मांगा है। जलसंकट से निपटने के लिए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तुलसी सिलावट भी बैठकों में स्थिति पर चर्चा कर चुके हैं।
शहर के कई तालाबों में पानी कम बचा है। छोला बिलावली और लिंबोदी तालाब में एक फीट से भी कम पानी होने की जानकारी दी गई है। पिपलियापाला तालाब में 22 फीट की क्षमता के मुकाबले करीब 7.6 फीट पानी शेष बताया गया है। यशवंत सागर, बड़ा बिलावली, बड़ा सिरपुर और छोटा सिरपुर तालाबों में भी जलस्तर घटने की चिंता है।
6,040 ट्यूबवेल में से 361 बंद
नगर निगम की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, इंदौर में कुल 6,040 ट्यूबवेल हैं, जिनमें से 361 बंद हो चुके हैं। शहर की जरूरत पूरी करने के लिए करीब 200 नए ट्यूबवेल खोदने की आवश्यकता बताई गई है। इनमें से 100 के लिए टेंडर आमंत्रित किए गए हैं।
नगर निगम बंद ट्यूबवेल की मरम्मत और पंपों की तकनीकी समस्याओं को दूर करने के लिए 10 समर्पित टीमें लगाने की योजना बना रहा है। शहर के 22 जोन में पानी की किल्लत की जानकारी सामने आई है। कुछ इलाकों में लोग अभी से टैंकरों के जरिए पानी जुटा रहे हैं।
शहर में कुल 105 जलप्रदाय टंकियां हैं, जिनमें से 95 से रोजाना जलापूर्ति की जा रही है। शेष 10 टंकियों से नियमित सप्लाई नहीं होने के कारणों का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है।
टैंकरों के लिए 71 नए हाइड्रेंट चिह्नित
आपात स्थिति में टैंकरों से पानी पहुंचाने के लिए नगर निगम ने 71 नए हाइड्रेंट स्थान चिह्नित किए हैं। इसके अलावा 12 मौजूदा समप-हाइड्रेंट स्थानों को आपातकालीन जल भराव केंद्र के रूप में इस्तेमाल करने की योजना है।
प्रस्ताव के तहत नए समप की संभावनाएं तलाशने और जरूरत के मुताबिक ट्यूबवेल या पाइपलाइन को इन केंद्रों से जोड़ने पर विचार किया जा रहा है। इससे प्रभावित क्षेत्रों तक टैंकरों के माध्यम से पानी पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
एमआईसी सदस्य बबलू शर्मा के अनुसार, जलसंकट से बचाव के लिए योजना तैयार की जा रही है और नए ट्यूबवेल खोदने की दिशा में काम किया जाएगा। निगम का लक्ष्य गर्मियों में लोगों को पानी की परेशानी से बचाना है।
उज्जैन में गंभीर डैम से 70 दिन की जलापूर्ति का अनुमान
उज्जैन में इस बार करीब 682 मिलीमीटर यानी लगभग 27 इंच बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश करीब 35 इंच मानी जाती है। कम बारिश के कारण शहर को पानी देने वाला गंभीर डैम पूरी क्षमता तक नहीं भर पाया।
डैम की कुल क्षमता 2,250 एमसीएफटी है, जबकि इस बार जलस्तर करीब 636 एमसीएफटी तक पहुंचा। इसमें से लगभग 100 एमसीएफटी डेड स्टोरेज घटाने के बाद जलापूर्ति के लिए उपलब्ध पानी से करीब 70 दिन, यानी 22 दिसंबर तक सप्लाई किए जाने का आकलन है।
उज्जैन नगर निगम के अपर आयुक्त पवन कुमार सिंह के मुताबिक, इससे पहले जून में भी गंभीर डैम में पानी की कमी के चलते नर्मदा पाइपलाइन से पानी लेकर रोजाना जलप्रदाय किया गया था। अब एक बार फिर नर्मदा से पानी लेने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है।
जलसंकट का असर आने वाले समय में सिंहस्थ की तैयारियों पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। शहर में भूजल स्तर 200 फीट तक पहुंचने की जानकारी भी सामने आई है।
धार में कम बारिश, ट्यूबवेल और तालाबों का जलस्तर घटा
धार जिले में इस बार करीब 25.84 इंच बारिश दर्ज की गई है, जबकि पिछले साल औसत बारिश 51.13 इंच बताई गई थी। कम बारिश के कारण कई क्षेत्रों में बोरिंग से पानी कम निकल रहा है या वे बंद हो गए हैं। किसानों को सिंचाई में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
धार शहर की करीब डेढ़ लाख आबादी की पेयजल जरूरतें पूरी करने वाले दिलावरा, नटनागरा, नयापुरा और सीतापाट तालाबों में लगभग 25 से 30 प्रतिशत पानी बचने की जानकारी दी गई है। वहीं, मुंज तालाब करीब 40 प्रतिशत भरा बताया गया है।
पेयजल स्रोतों में घटते जलस्तर के कारण आने वाले महीनों में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ने की आशंका है। स्थानीय किसान जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
खेती पर भी पड़ सकता है असर
कम बारिश का असर रबी की फसलों की बुवाई पर पड़ने की आशंका है। भारतीय किसान संघ से जुड़े किसानों के अनुसार, इस बार गेहूं का रकबा 75 प्रतिशत तक घट सकता है। मालवा क्षेत्र में लहसुन और प्याज की बुवाई का रकबा भी 70 प्रतिशत तक कम होने की आशंका जताई गई है।
पर्याप्त नमी नहीं होने के कारण कुछ किसान गेहूं, लहसुन, प्याज और मटर के बजाय चना, तिवड़ा, तुकमारिया, रायड़ा और कम पानी में तैयार होने वाली दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। यदि पानी की कमी बनी रहती है, तो उत्पादन और बाजार में कीमतों पर असर पड़ सकता है।
11 जिलों में जलसंकट की चिंता
प्रदेश के जिन जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है, वहां नदियों, बांधों और भूजल की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ रही है। प्रभावित जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग भी उठ रही है।
आने वाली गर्मियों में संकट को कम करने के लिए बंद ट्यूबवेल चालू करना, नए जलस्रोत विकसित करना, टैंकर व्यवस्था तैयार रखना और वर्षाजल संचयन व भूजल पुनर्भरण पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल, अलग-अलग शहरों में प्रस्तावित उपायों और सरकारी सहायता पर आगे की कार्रवाई का इंतजार है।