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आज श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस पर जाने मुग़लों के अत्याचारों की कहानी

धर्म इतिहास

30 मई को श्री गुरु अर्जुन देव जी का शहादत दिवस हैं और आज हम उनके बारे में इतिहास से जुडी ऐसी बातें बताने जा रहें हैं. जो दुर्भाग्य से भारत में अधिकाँश लोग नहीं जानते और न ही सरकारों ने इसे पढ़ाना जरूरी समझा. उम्मीद है आप इस जानकारी को देश के ज्यादातर लोगों तक पहुँचाने में हमारी मदद करेंगे.

श्री गुरु अर्जुन देव जी सिखों के पांचवें गुरु थे और उनका जन्म 15 अप्रैल साल 1563 में हुआ था. श्री गुरु अर्जुन देव जी ने लोगों और धर्म के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था. वह सभी धर्मों और उन्हें मानने वालों का सम्मान करते थे. उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन लोगों की सेवा करने में व्यतीत किया था.

श्री गुरु अर्जुन देव जी के पिता जी का नाम श्री गुरु रामदास और माता जी का नाम बीबी भानी था. श्री गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु थे और बीबी भानी के पिता जी यानी श्री गुरु अर्जुन देव जी के नाना गुरु अमरदास जी सिखों के तीसरे गुरु थे. श्री गुरु अर्जुन देव जी का बचपन श्री गुरु अमरदास जी की ही देख-रेख में व्यतीत हुआ था और उन्होंने ही इन्हें गुरुमुखी की शिक्षा दी थी.

जब श्री गुरु अर्जुन देव जी बड़े हुए तो 1589 में 26 साल की आयु में उनका विवाह माता गंगा जी के साथ हुआ. जिसके बाद 1595 में माता गंगा जी ने पुत्र को जन्म दिया जिनका नाम श्री गुरु हरगोविंद रखा गया जो की बाद में सिखों के छठे गुरु बने. 1581 में श्री गुरु अर्जुन देव जी के पिता जी ने अपनी गद्दी का वारिस घोसित किया था और उन्होंने ही आगे चलकर अमृतसर में एक मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता हैं. इसके लिए उन्होंने शिलान्यास मुस्लिम फ़कीर साईं मिया मीर जी से करवाया था.

सिख धर्म बनने के बाद इसे गुरुद्वारा कहा जाना शुरू हुआ और इसका नक्शा खुद श्री गुरु अर्जुन देव जी ने बनाया था. श्री गुरु अर्जुन देव जी ने ही पवित्र ग्रन्थ श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन भाई गुरदास जी की मदद से शुरू किया. उन्होंने इस ग्रंथ को पूरा करने के लिए रागों के आधार पर गुरु वाणियों का वर्गीकरण किया इसके साथ ही उन्होंने अपनी भी कई वाणियों के साथ-साथ इसमें भक्त कबीर, बाबा फरीद, संत नामदेव, संत रविदास जैसे अन्य संत-महात्माओं की वाणियों को भी जोड़ा.

श्री गुरु अर्जुन देव जी ने पंजाब में बहुत सरे गाँवों में कुओं का निर्माण करवाया जिससे लोगों को पिने की पानी की समस्या का समाधान मिला और उन्हें पानी के लिए दूर दराज़ के गांवों में जाने से भी मुक्ति मिली. इसके साथ ही श्री गुरु अर्जुन देव जी ने अमृतसर में नए नगर भी बसाये जिनके नाम हैं, तरनतारन साहिब, करतारपुर साहिब, छेहर्टा साहिब, श्री हरगोबिंद पूरा. श्री गुरु अर्जुन देव जी ने ही अमृतसर को आस्था का केंद्र बनाया था.

“सरबत दा भला” जैसे विचार रखने वाले श्री गुरु अर्जुन देव जी को 30 मई 1606 में मुगल शासक जहांगीर ने उन्हें भरपूर गर्मी के दिन गर्म लोहे के तवे पर बैठाकर उनके ऊपर गर्म रेत डलवाई थी. जब उनका शरीर पूरी तरह से झुलस गया तो उन्हें ठन्डे पानी से नहाने के लिए रावी नदी के पास भेजा गया जहाँ फिर उन्होंने आपने प्राण त्याग दिए. आपको बता दें की मुगल शासक जहांगीर ने उन्हें “यासा व सियासत” कानून के तहत यह सज़ा दी थी, इस कानून के आधार पर सज़ा पाने वाले इंसान का एक बूँद खून धरती पर गिराए बिना उसे मारने के तहत बनाया गया था.

उनकी याद में एक गुरुद्वारा रावी नदी के पास बनाया गया था जो की आज के समय में पाकिस्तान में मजूद हैं. श्री गुरु अर्जुन देव जी ने अपनी संगत को परमात्मा की रज़ा में राज़ी रहने का सन्देश दिया था. वह इतने विनर्म दिल के थे की जब जहांगीर उनको गर्म लोहे के तवे पर बैठाकर ऊपर से रेत डलवा रहा था, तब भी वह परमात्मा का शुक्रिया अदा कर रहे थे.

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